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मई, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भारतीय वैदिक ज्योतिषशास्त्र भाग - ५० कुंडली चक्रों के वर्गभेद, होरा चक्र साधन विधि एवं होरा चक्र फलकथन :

  कुंडली चक्रों के वर्गभेदः  एक राशि में ३० अंश होते हैं। राशि को पूर्वाचार्यों ने दश प्रकार से विभाजित किया है । इनको अलग-अलग नाम दिये हैं। इन्हीं विभाजनों को वर्ग कहा गया है। १. गृहक्षेत्र या राशि,  होरा,  द्रेष्काण, सप्तमांश, नवमांश, दशमांश,  द्वादशांश,  षोडशांश, त्रिंशांश और  षष्ट्यंश-ये दश वर्ग हैं। इन दश वर्गों में  गृह, होरा,  द्रेष्काण,  सप्तमांश,  नवमांश,  द्वादशांश और त्रिंशांश इनको सप्त वर्ग कहते हैं। सप्तवर्ग में सप्तमांश को छोड़कर गृह,  होरा, द्रेष्काण,  नवांश,  द्वादशांश और  त्रिंशांश को षड्वर्ग कहते हैं। कुछ आचार्यों के मतानुसार राशि और भाव फल के समान ही नवांश का फल होता है। राशिवर्ग में पूर्ण फल होता है। षोडशांश, दशमांश और षष्ट्यंश वर्गों में एक चौथाई तथा शेष होरा, द्रेक्काण, नवमांश, सप्तमांश, द्वादशांश और त्रिंशांश वर्गों में आधा फल प्राप्त होता है। होरा  :   विषम राशि मेष, मिथुन आदि में १५ अंश तक सूर्य का होरा और १६ अंश से ३० अंश तक चन्द्रमा का होरा होता है। ...

Origin of Vastu Purush Vastu Shastra Part - 3

  Different things have been said about the origin of Vastu Purush, but everywhere Lord Shiva and the demon named Andhak have been depicted as characters. In the light of the legend in the Matsya Purana, it has been said that in ancient times there was a fiercely powerful demon named Andhak. Lord Shiva had to fight a terrible war with this demon. During this war, sweat started coming out from the forehead of Lord Shiva. A drop of sweat from his forehead, generated from the hard work of the terrible war, fell on the earth. This sweat (sweat) gradually turned into a giant body. After assuming the body, this gigantic man, for his hunger for peace, would have licked the blood-red dead body that fell on the battlefield in a moment. When Andhakasur was killed by Lord Shiva and his dead body also fell on the earth, it also turned it into grass. Even then his hunger was not satisfied, then he started penance for the pleasure of his father Shiva. Pleased with his severe penance, Shivji aske...

गृहस्थाश्रम में वास्तुशास्त्र का महत्व : भाग - 2

     गार्हस्थ जीवन जीने के लिए प्रत्येक मनुष्य को देश-कालानुरूप गृह-निर्माण करना आवश्यक होता है। इसी निर्माण के तहत स्थायित्व, संवर्धन, कुटुम्बिया आवागमन, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संरचनाओं का आदान-प्रदान आदि होता है। सृजनात्मक प्रवृत्तियों में नवीनता आती है। विविध कलाकृतियों का एकीभूत केन्द्रीयकरण होता है। इन्हीं विविध सृजनात्मक कलाओं के फलस्वरूप उत्तम गृह का निर्माण सम्भव हो पाता है। उत्तम गृह का निर्माण तभी सम्भव है, जब उत्तम गृहस्थ भी हों। उत्तम गृहस्थ के गुणों का वर्णन महर्षि व्यास ने बहुत सरल ढंग से इस प्रकार किया है- दया श्रद्धा क्षमा लज्जा प्रज्ञा त्यागः कृतज्ञता । गुणा यस्य भवन्त्येते गृहस्थो मुख्य एव सः ॥  अर्थ यह है कि जिसमें दया, क्षमा, लज्जा, उत्तम विवेकपूर्ण बुद्धि, त्याग, आदर भाव ये सभी गुण विद्यमान हों, वही मनुष्य मुख्य गृहस्थ है। अथर्ववेद में कहा है कि जो गृहस्थ है उसको घर बनाना आवश्यक है। घर घास-फूस की बनी झोंपड़ी हो या अन्य वस्तुओं से निर्मित विशाल भवन, किन्तु घर बनाना एक गृहाश्रमी हेतु अति आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं होता है तो गृहस्...

Importance of Vastu Shastra in Grihasthashram Part - 2

  To live a domestic life, it is necessary for every human being to build a house according to the time and country. Under this construction, stability, promotion, movement of family members, exchange of social and cultural structures etc. take place. Innovation comes in creative tendencies. There is a unified centralization of diverse artefacts. As a result of these various creative arts, the construction of a perfect house becomes possible. The construction of a perfect home is possible only when there are perfect householders. Maharishi Vyas has described the qualities of a good householder in a very simple way as follows- दया श्रद्धा क्षमा लज्जा प्रज्ञा त्यागः कृतज्ञता । गुणा यस्य भवन्त्येते गृहस्थो मुख्य एव सः ॥ The meaning is that the person in whom kindness, forgiveness, shame, good rational intelligence, sacrifice, respect, all these qualities are present, that person is the main householder. It has been said in the Atharvaveda that it is necessary for a hous...

भारतीय वैदिक ज्योतिषशास्त्र : ( गणित ) अन्तर्दशा साधन विधि तथा प्रत्यन्तर्दशा साधन विधि :भाग - ४९

 अन्तर्दशा साधन विधि  : महादशा संख्या वर्ष में महादशा वर्ष संख्या का गुणाकर १० से भाग देने पर प्राप्त लब्धि मास ( माह ) होंगे।  ( यदि माह संख्या १२ से अधिक हों तो इसको सवर्णित कर साल तथा  माह बना लें ) शेष को ३० से गुणाकर १० से भाग देने पर प्राप्त लब्धि दिन कहलाएंगे।  उदाहरण :  मान लीजिए गुरु की महादशा में गुरु की ही अन्तर्दशा निकालनी हो तो आप जानते है गुरु की महादशा १६ वर्ष की होती है। इसलिए नीचे १६ को लिया गया है, अन्य उपरोक्त सूत्र के अनुसार साधन किया गया है।  १६ *१६ = २५६ भाग १० = २५ मास अथार्त २ साल १ माह प्राप्त हुआ।  शेष ६ * ३० = १८० भाग १० = १८ दिन प्राप्त हुआ।  अथार्त २ साल १ माह १८ दिन होगी। गुरु के महादशा में गुरु का अंतर्दशा प्राप्त हुआ।  इसी प्रकार यदि गुरु की महादशा हो और शनि कीअन्तर्दशा निकालनी हो तो आप मेरे पहले के लेखों के द्वारा जान चुके है कि शनि की महादशा १९ साल की होती है। इसलिए साधन में ( १६ ) गुरु के महादशा वर्ष और ( १९ ) शनि के महादशा के वर्ष लिए जाएंगे।    १६ *१९ = ३०४ भाग १० = ३० मास को १२ से सवर्णित क...

Indian Vedic Astrology: (Mathematics) Antardasha Sadhan Vidhi and Pratyantardasha Sadhan Vidhi: Part - 49

 Introspection method: In a Mahadasha year number, multiplying the Mahadasha year number and dividing it by 10, the gain obtained will be months (months). (If the month number is more than 12, then convert it into year and month) The remainder obtained by multiplying the remainder by 30 and dividing it by 10 will be called days. Example : Suppose, in Jupiter's mahadasha, you want to find out the inner condition of Jupiter, then you know that Jupiter's mahadasha lasts for 16 years. That's why 16 are taken below, others are arranged according to the above formula. 16 * 16 = 256 part 10 = 25 months ie 2 years 1 month received. Remaining 6 * 30 = 180 divided by 10 = 18 days obtained. That means it will be 2 years 1 month 18 days. Guru's antardasha was attained in Guru's Mahadasha. Similarly, if Jupiter's Mahadasha is there and Shani's Antardasha is to be found, then you have come to know from my earlier articles that Shani's Mahadasha lasts for 19 years. Tha...

वास्तुशास्त्र एवं वास्तु महत्त्व भाग - 1

                      "गणेशाय नमो नमः " वास्तुशास्त्र एवं  महत्त्व :  वास्तु शास्त्र घर, भवन अथवा मन्दिर निर्माण करने का प्राचीन भारतीय विज्ञान है जिसे आधुनिक समय के विज्ञान आर्किटेक्चर का प्राचीन स्वरुप माना जा सकता है। जीवन में जिन वस्तुओं का हमारे दैनिक जीवन में उपयोग होता है उन वस्तुओं को किस प्रकार से रखा जाए वह भी वास्तु है वस्तु शब्द से वास्तु का निर्माण हुआ है। वास्तु' शब्द का अर्थ ही है 'निवास करना'; अर्थात् जहाँ-जिस भूखण्ड पर गृह, मठ, मन्दिरादि का प्रारम्भिक उद्योग कर मनुष्य निवास करता है, उसे ही 'वास्तु' कहते हैं।  दक्षिण भारत में वास्तु शिल्प की शृंखला  मायन या  मय या मयासुर के अनुसार निर्माण हुआ है। मन्दोदरी मयदानव की पुत्री थी। मय  एक प्रसिद्ध दानव है। एक महान वास्तुकार, ज्योतिषी और तकनीकि इंजीनियर थे, लेकिन जन्म से एक दानव है ।  उत्तर भारत में वास्तु शिल्प की शृंखला विश्वकर्मा जी के अनुसार निर्माण हुआ है। भगवान विश्वकर्मा की ऐसी  मान्यता है कि उन्होंने ब्रह्माजी के साथ मिलकर इस ...

Vastu Shastra and Vaastu Importance Part - 1

    "Ganeshay Namo Namah" Vastu Shastra and Importance: Vastu Shastra is the ancient Indian science of building a house, building or temple, which can be considered as the ancient form of science architecture of modern times. The things which are used in our daily life, how to keep those things is also Vastu. Vastu has been formed from the word Vastu. The word 'Vastu' itself means 'to dwell'; That is, the land on which a man resides by doing the initial industry of house, monastery, temple, etc., is called 'Vastu'. In South India, the series of Vastu Shilp has been built according to Mayan or Maya or Mayasur. Mandodari was the daughter of Maydanav. Maya is a famous demon. He was a great architect, astrologer and technical engineer, but a demon by birth. In North India, the series of Vastu crafts have been built according to Vishwakarma ji. Lord Vishwakarma is believed to have created this universe along with Lord Brahma. In this wa...

कुंडली के 12 राशि, राशि - के स्वामी, दिशा, गुण, तत्त्व, स्वभाव, कष्टप्रद वर्ष - भाग -2

 पिछले भाग का शेष ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,  7 - तुला राशि : तुला राशि  का स्वामी शुक है। यह चर राशि, रजोगुणी, पश्चिम दिशा,  तथा वायु तत्व राशि है। तुला राशि के जातक लोगों द्वारा सम्मानित, धनी, भोगी, चतुर, बुद्धिप्रधान, कला चतुर, सरकार से सहायता प्राप्त, मिष्टान्न प्रेमी, माता-पिता का भक्त, देवता, ब्राह्मण, गुरु, अतिथियों की सेवा करने वाला, वस्तु संग्रही, विद्वान्, वाचाल, अच्छे मित्रोंवाला, काव्य, संगीत आदि का प्रेमी, प्रबन्ध कार्य में कठोर, समान्यतया कोमल, प्रायः दो नामोंवाला, देवता विषयक नामवाला, प्रत्येक कार्य में दूसरों से सलाह लेने वाला, लम्बी आकृति, प्रायः कृशकाय, ऊँची नासिका वाला, वायु प्रकृति, शिरोव्यथा, उदर रोग अथवा चर्म रोग सम्भव, स्त्री के अधीन रहने वाला, अल्प सन्तान, भाइयों से सहयोग न पाने वाला, कृषि अथवा व्यापार से लाभ, ऊँची शरीर, आस्तिक, दानी, धनी, राजा अथवा राजा के समान तथा परोपकारी होता है। जन्म से 1, 3, 5, 15, 25, 46 वें में रोग या शारीरिक कष्ट  सम्भावना रहती है। तुला, मकर, कुम्भ, वृष, मिथुन तथा कन्या राशिवालों से मैत्री,  व्यापार तथा स...