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जन्मदिन एक है, वार्षिक श्राद्ध विभिन्न दिन क्यों ? जन्मदिन सही है तो मृत्युदिन गलत क्यों ? मृत्युदिन सही है, तो जन्म दिन गलत क्यों ? भाग - 2

आप सभी को प्रणाम, आप ने पहला भाग -1  पढ़ लिया होगा,  यह दूसरा भाग है, आप सभी से अनुरोध करना चाहता हूँ आप इस लेख को पूरा पढ़ें, उसके बाद ही किसी निर्णय पर पहुंचना सार्थक प्रयास होगा। 




कुछ प्रश्न और उनके उत्तर :


प्रश्न - 1 मकर संक्राति 14 -15 - 16 को क्यों, एक दिन क्यों नहीं ?


उत्तर :  हिन्दू धर्म के लोगों को मकर संक्राति एक दिन ही मनाना चाहिए। हम लोग  को सौरमास और सूर्य से सम्बंधित पूजा, अनुष्ठान, पर्व, तीज त्यौहार को सूर्य को प्रमाण मान कर मनाना चाहिए। प्रत्येक शुभ पर्व का प्रमाण है, उस प्रमाण को ही परिणाम में लेना सार्थक होगा। मकर संक्रांति अथार्त सूर्य मकर के महीने में पहला दिन या मकर राशि में प्रवेश। लेकिन इस पर्व को 14 -15 -16 करने की क्या आवश्यकता है ? मान लीजिए सूर्य मकर राशि में दिनांक 14  जनवरी के सायं 7  बजे प्रवेश किया है, सभी हिन्दू धर्म के लोग एक साथ मिलकर 15 जनवरी को क्यों नहीं मना सकते है ? परन्तु कुछ विशेषज्ञ भिन्न तर्क देकर विभिन्न दिन कर देते है। जबकि स्थिति स्पष्ट है सूर्य की संक्रांति का मतलब महीने का पहला दिन, सूर्य 24 घंटे  में लगभग एक अंश का भोग करता है, इसी को सौरमास का दिन कहते है  इसका सीधा अर्थ यह है की 15 जनवरी के सायं 7 बजे तक सूर्य का पहला दिन ही रहेगा। दूसरी तरफ 14 जनवरी मानने वालो की अगर बात किया जाय तो क्या वे 14 जनवरी के दिन में ही स्नान, दान, पूजा, सूर्यार्घ्य  देकर संक्रांति मना कर क्या संदेश देना चाहते है ? जबकि उस समय सूर्य मकर में नहीं बल्कि धनु राशि में है। यदि वे यह कहते है हम सायं काल में स्नान, दान, पूजा, सूर्यार्घ्य देंगे तो क्या यह व्यावहारिक और शास्त्र सम्मत है ? सूर्य को अर्घ्य कैसे देंगे ? 


अब इसी प्रश्न को दूसरी तरफ से भी देख लीजिए, यदि सूर्य मकर राशि में प्रातः 6 बजे प्रवेश करता तो क्या आप इतनी ही तत्परता से प्रातः 6 बजे स्नान, दान, पूजा, सूर्यार्घ्य देने पहुंच जाते ? या फिर सुबह 8  बजे तक सोए ही रहते ? इसका अर्थ यह है की इस दिन आप शाम तक संक्राति मान रहे है। यही कारण है की आप 8  बजे तक उठेंगे। 

सत्य क्या है ?  यह एक खगोलीय घटना है, जो 24 घंटे तक बनी रहेगी। अथार्त संक्राति के समय से अगले २४ घंटे तक यथावत स्थिति अथार्त सौरमास का पहला दिन है। 


प्रश्न - 2 हिन्दू धर्म में तिथि क्षय या वृद्धि दोनों ही माने जाते है ( श्राद्ध पितृपक्ष में हो या नवरात्र शुक्ल पक्ष में ) इसको हम सभी जानते है और मानते है। यही तिथियां जब किसी त्यौहार में क्षय या वृद्धि होती है तब क्यों नहीं मानते है। एक ही विषय के दो अनुवाद क्यों ? 


उत्तर : ऐसा करना गलत ही नहीं बल्कि ख़तरनाक भी है क्योंकि ऐसा करने से त्यौहार के महत्त्व को अल्प तो कर ही रहे है बल्कि हिन्दू धर्म के लोगों के बीच एकता का अभाव बढ़ेगा और स्वाभाविक है भेद भाव भी पनप जायेगा। 


प्रश्न - 3 हम सौरमास को ही क्यों मानें चंद्र मास में क्या समस्या है ?


उत्तर : आपको यह कोई नहीं कह रहा है कि आप कोई एक को चुनने के लिए दूसरे को छोड़ दीजिए। आपको यह बताया जा रहा है कि एक क्षय है, दूसरा अक्षय यदि आपको काल की गणना करना है तो आप क्या करेंगे ? क्षय की गणना कर परिणाम क्या चाहते है  ? यदि अक्षय की गणना करके सही निर्णय कर सभी एकमत होकर, एकता का प्रतिक बनना नहीं चाहेंगे वास्तव में अक्षय से गणना का परिणाम भी सटीक होगा। चंद्र, नक्षत्र, चंद्र तिथि, चंद्र मास एवं चंद्र वर्ष का क्षय होता है, हम बार बार यही तो कह रहे है।  दूसरी तरफ सूर्य है जो की अक्षय है जिसकी गति, सौरमास, सौरवर्ष लगभग एक समान है सिर्फ प्रत्येक 74 वर्ष के बाद में अति  सूक्ष्म अंतर होता है उस अंतर से आपके दिन तो क्या घंटा, घटी में भी अंतर नहीं पड़ता है। 


प्रश्न - 4 कुछ लोग क्षय या वृद्धि  तिथि को नहीं मानते है उनको क्या कहा जाए ?


उत्तर : कोई मानता ही नहीं है तो उसका कुछ नहीं  हो सकता है। उसको अकेला कर दीजिए अन्य लोग एकमत होकर एक साथ पर्व मनाना शुरू कर दीजिए। थोड़ा विलम्ब होगा वह व्यक्ति भी एक समय के बाद मान जायेगा । यदि उत्तर को अधिक दीर्घ ना करूँ तो जवाब यह है कि इस वर्ष 2023 में 13 महीने का साल हो रहा है उस व्यक्ति को इस साल की वृद्धि भी नहीं माननी चाहिए। 


प्रश्न - 5 सूर्य और सौरमास  प्रमुख क्यों ?


उत्तर : सूर्य के कारण ही सभी घटना क्रम निर्धारित है। तिथि, नक्षत्र, वर्ष आपने समझ लिया है आइये अब आपको कुछ और तथ्य देता हूँ। आपने पंडित जी के माध्यम से सुना ही होगा की इस वर्ष विवाह मुहूर्त नहीं है। क्योंकि गुरु अस्त है या शुक्र अस्त है। जब भी ये दोनों ग्रह अस्त हो जाते है उस समय विवाह मुहूर्त नहीं होते है। अब आप भी इस प्रश्न को आगे नहीं बढ़ाते है, और पंडित जी भी आपको समझाते नहीं है। वास्तव में गुरु या शुक्र को अस्त सूर्यदेव ही कर रहे है। जब गुरु या शुक्र का उदय होगा तभी मांगलिक संस्कार आरम्भ होंगे। अथार्त यहाँ भी सूर्य की ही उपयोगिता है। सामान्यतः कुंडली में बुध - सूर्य के युति को बुधादित्य योग कह कर फलित करने वाले विद्वान फल बताने लग जाते है। वास्तविकता यह है की इस योग को सूर्यदेव विफल / भंग कर सकते है। यदि बुध अस्त है तो यह योग विफल हो जायेगा, अतः यहाँ भी सूर्य को ही देखा जाता है। यह ठीक उसी प्रकार से है जैसे सूर्य से चंद्र 180 अंश पर हो तो पूर्णिमा कहलाता है और यदि चंद्र 360 अंश ( एक साथ ) पर हो तो अमावस्या होती है। वास्तव में सूर्य के कारण ही चंद्र उदय या अस्त होता है।


प्रश्न - 6 क्या चंद्र मास या चंद्र के अनुसार नहीं मानना चाहिए ?


उत्तर : ऐसा बिल्कुल नहीं है बल्कि ऐसा सोचना भी गलत होगा। चान्द्रमास और चंद्र से सम्बंधित पूजा, अनुष्ठान, पर्व, तीज त्यौहार को चंद्र को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए। जैसे अक्षय तृतीया, वसंत पंचमी, अष्टमी, महानवमी चतुर्दशी आदि। किन्तु तिथि,नक्षत्र,मास सभी को समान क्रम से  सूर्योदय कालीन देखना और लेना चाहिए।  तिथि, नक्षत्र, पूर्णिमा, अमावस्या, कृष्ण पक्ष, शुक्ल पक्ष आदि चंद्र के ही है। इनको मानना ही होगा क्योंकि मुहूर्त ज्ञान और संस्कार इनके माध्यम से ही संपन्न होंगे  किन्तु इनका अस्तित्व सूर्य से है इसलिए सूर्योदयकालीन लेना उत्तम और उचित, उपयुक्त होगा। 


आजकल जो हो रहा है, वो कुछ ऐसा दिखाई दे रहा है जैसे कोई व्यक्ति हावड़ा की ट्रेन में यात्रा कर कोलकाता जा रहा है, आधे रास्ते लखनऊ में ट्रेन रुकी तो दिग्भ्रमित होकर व्यक्ति उस ट्रेन से उतर कर, पास में खड़ी दिल्ली जाने वाली ट्रेन में बैठ गया, और लक्ष्यहीन, दिशाहीन, स्वचालित और सुविधाजनक होकर अब  लोगों को यात्रा का मार्ग भी बताने लग गया है। 


विशेष : चंद्र मास और सौरमास को अलग अलग देख कर चलना चाहिए जब जैसा पर्व हो उसी ग्रह से सम्बंधित और सिद्धांत को ध्यान में रखकर वैसा निर्णय होना चाहिए। एक जगह सिद्धांत का उपयोग कर, वहीं दूसरी जगह सिंद्धांत को त्याग कर  दशा, दिशा और मतिभ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है।


कुछ प्रश्न आपके जानकारी और स्मरण के लिए नीचे देना चाहूंगा :


1 - यदि तिथि का क्षय हो तो क्या वार्षिक श्राद्ध नहीं मनाया जाना चाहिए?


2 - यदि तिथि की वृद्धि हो जाय तो वार्षिक श्राद्ध किस दिन मनाया जाना चाहिए ?


3 - यदि मास की वृद्धि हो तो वार्षिक श्राद्ध ( 365 दिन से अधिक ) 13 माह में करना चाहिए? 


4 - यदि मास का क्षय हो तो वार्षिक श्राद्ध ( 365 दिन से पहले ) 12  माह से पहले ही कर देना चाहिए ?


5 - फरवरी 29 को जिनका जन्म हुआ है, वे 4 साल बाद जन्मदिन या 29 फ़रवरी को जिनकी मृत्यु हुई है वे वार्षिक श्राद्ध 4 साल बाद करेंगे ? अथार्त अंग्रेजी तिथि भी उचित नहीं है। 


6 - रावण दहन 2 दिन करना क्या यह हिन्दू धर्म के लिए उचित है ? क्या पुनः हिन्दू धर्म अतीत के तरह विभक्त होता जा रहा है ?


7 - मकर संक्रांति भी दो दिन मनाया जाना क्या यह उचित है ?


8 - कृष्णा जन्माष्टमी, वसंत पंचमी भी दो दिन मनाने वाले लोग किधर जा रहे है ?


9 - शंकराचार्य की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए ?  क्या शंकराचार्य स्वयं की भूमिका का निर्वाह, योगदान, और धर्म का मार्गदर्शन कर रहे है ?


10  - आपको क्या लगता है हिन्दू धर्म से कोई एक व्यक्ति खड़े होकर हम सब को एकत्रित कर पायेगा ? क्या हम सभी किसी एक व्यक्ति के बात को स्वीकार्य कर सकते है ?


जन्मदिन सही या मृत्युदिन गलत ? मृत्युदिन सही  या जन्म दिन गलत ?


इसका जवाब बहुत बड़ा हो सकता है लेकिन आप पहले ही बहुत पढ़ चुके है इसलिए अब आपको एक वाक्य में बताना चाहूंगा। आप सौरमास को मानना शुरू कर दीजिए, इसी को स्वीकार्य करना श्रेष्ठ रहेगा। क्योंकि आत्मा जन्म लेने के लिए किसी मुहूर्त को नहीं देखती और  शरीर त्यागने के लिए भी आत्मा मुहूर्त को नहीं देखा करती है। क्योंकि आत्मा अजेय है। यदि आप सौरदिन के अनुसार जन्मदिन या मृत्यु दिन का संस्कार करते है तो सूर्य देव प्रत्येक वर्ष वही स्थित होंगे जहाँ वे उक्त घटना के समय स्थित थे। अथार्त राशि अंश में कोई अंतर नहीं होगा। गोचर में सूर्य प्रत्येक वर्ष उसी दिन वहीँ विद्यमान रहते है, इसका सीधा अर्थ यह भी मान सकते है कि अभीष्ट संस्कार के समय प्रत्येक वर्ष सूर्यदेव साक्षी के रूप में संस्कार के आत्मा के कारक होंगे। 


उदाहरण के रूप में दो घड़ियाँ ले लीजिए, एक घडी हमेशा पीछे चलती है, दूसरी घडी सटीक समय बताती है, बार बार पीछे चलने वाली घडी को सही समय बताने वाली घडी के अनुसार मिलाना पड़ता है। अब यह घडी आप चंद्र को मान लीजिए सही घडी सूर्य को मान लीजिए, चंद्र वर्ष लगभग एक साल में सूर्य वर्ष से 10 दिन पीछे हो जाता है, लगभग 3 साल में एक महीना, चंद्र वर्ष को सूर्य वर्ष के बराबर लाने के लिए प्रत्येक 3 साल बाद चंद्रवर्ष  के 13 महीने कर दिए जाते है। यदि में सप्ताह पूछूं तो आप 7 दिन बोलेंगे, यदि मैं साल पूछूं तो आप 12 महीने ही कहेंगे। 


 सूर्य वर्ष  और चंद्र वर्ष को आंकड़ों में समझाकर बताएं  ?


चंद्रवर्ष का एक उदाहरण : ( घटना 4 नवम्बर 2022 के अनुसार )


1 -कार्तिक शुक्लपक्ष एकादशी  तिथि 2022 सूर्य तुला राशि में ( 4 नवम्बर 2022 )

2 -कार्तिक शुक्लपक्ष एकादशी तिथि 2023 सूर्य तुला के बजाय वृश्चिक राशि में ( 23 नवम्बर 2023  )


अथार्त 19 दिन का विलंब और एक राशि का अंतर ( सूर्य  तुला राशि के बजाय वृश्चिक राशि में विराजमान )



सौरवर्ष का एक उदाहरण : ( घटना 4 नवम्बर 2022 के अनुसार )


1 - कार्तिकसौरमास ( तुला मास ) 17वीं तिथि 2022 सूर्य तुला राशि में ( 4 नवम्बर 2022 ) सूर्य स्पष्टमान 6 / 16 / 51 / 56 अथार्त तुला राशि में 16 अंश 51 कला 56 विकला।  


2 - कार्तिकसौरमास ( तुला मास ) 17 वीं तिथि 2023 सूर्य तुला राशि में ( 4 नवम्बर 2023 ) सूर्य स्पष्टमान 6 / 16 /36 / 29 अथार्त तुला राशि में 16 अंश 36 कला 29 विकला। 


विशेष ध्यान देंगे योग्य उत्तर :  " एक वर्ष के बाद भी कोई अंतर नहीं "


विशेष :  आपने सब पढ़ा समझा अब यही कहूंगा की यह विषय आपके संज्ञान में जा चुका है आप इसको कैसे लेते है किस प्रकार समझ पाते है यह सब आपका अधिकार है। अतीत में जातिगत बंटवारा कर, वर्तमान उसी का प्रतिविम्ब स्पष्ट दिखाई देता है कि आज लोग पूजा,पाठ, तिलक, कलावा, देवी, देवता किसी को नहीं मान रहे है। पुनः  वैसी ही शक्तियाँ आज हिन्दू पर्वो को अलग अलग दिन कह कर, बताकर, हिन्दू समाज को बांटने का काम कर रही है, आज की यह छोटी भूल 100-200 वर्षो के बाद बहुत बड़ी खाई में परिवर्तित हो जाएगी। 


उपसंहार :


अब तक जो आपने पढ़ा, उसको यदि सारांश में कहूँ तो मुहूर्त, तिथि, नक्षत्र, योग, करण एवं सूर्य को छोड़ अन्य सभी ग्रह, पर्व, त्यौहार अन्य जो भी कार्य है वे सभी आपके संकल्प संस्कार के शरीर है, संकल्प संस्कार की आत्मा सूर्य है, तथा शरीर और आत्मा का सामंजस्य ( प्रवेश ) करने का माध्यम लग्न है। अथार्त चंद्र, सूर्य और लग्न तीनों का सही, उचित सामंजस्य बिठाना ही विद्वान पुरोहित का कार्य है। 


पुनःउदाहरण देकर अपनी बात को विराम देना चाहूँगा। आप सभी जानते है विवाह देश और दुनियाँ सभी जगह संपन्न होते है। विवाह को लेकर भविष्य के अनंत सपने भी होते है। धन, समय, कुंडली मिलाना सभी कुछ किया जाता है। दिन, वार, महीना सब कुछ विधि के अनुसार ही करते है। लेकिन क्या लग्न के अनुसार विवाह संपन्न होते है ? जिस दिन को आप लग्न मान रहे है, वास्तव में वह विवाह मुहूर्त का दिन है जबकि लग्न की अवधी डेढ़ से दो घंटे के मध्य ही रहती है, पुनः दूसरा लग्न आरम्भ हो जाता है। विवाह के दिन बाराती सभी विषयों का आनंद लेते हुये झूमते, गाते, नाचते बारात रात्रि 9 ,10, 11 बजे पहुँचती हैं। सब कुछ करने के बाद क्या यह देरी करना उचित था या फिर वो सब औपचारिकता मात्र ही थी ? उस 

लग्न का क्या होगा जिसकी जिम्मेदारी  शरीर और आत्मा को मिला कर संस्कार संकल्प को उपयोगी बनाना था। 


जिस नेता को आप भला बुरा कहते है वही नेता जी स्वयं का नामांकन के लिए उसी लग्न को चुनते है जबकि चुनाव 5 वर्षो के लिए ही है। 


प्राचीन समय में बारात गोधूलि बेला में पहुंच कर, बारात का शुभ मुहूर्त में आदर सत्कार एवं वर-वधु विवाह संस्कार की शुभ बेला में आरम्भ हो जाती थी। उसके उपरांत भोजन आदि कर रात्रि विशेष लग्न में विवाह संस्कार संपन्न होते थे। चर, स्थिर और द्विस्वभाव लग्न क्रमशः 24 घंटे ही रहते है, प्रत्येक लग्न 4 बार अभीष्ट कार्य फल हेतु अवसर प्रदान करता है, कार्य विशेष को ध्यान में रख कर इन लग्नों का चयन किया जाता है। औपचारिकता मात्र से फल कथन की चेष्टा करना दिवास्वप्न मात्र ही है। 


आप सभी का धन्यवाद। 


प्रणाम,


ज्योतिर्विद एस एस रावत 

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 In the previous article, I tried the Chandra Sadhan (Mathematics). You must have got the benefit of this. In Indian Vedic astrology, the solar system (Bhachakra) ie 360 degrees is divided into 12 parts. Thus the value of 1 part is 30 degrees. This 30 degree has an ascendant and a zodiac sign. There are total 12 zodiac signs and 12 ascendants. (The 27 Nakshatras have been divided into 12 parts. These 12 groups are called Zodiac) At the time of birth, the zodiac sign in which the Moon will be located in the sky, is called the native's zodiac sign. Will study The horoscope of Jatak / Jatika is the same, since Jatak / Jatika has not been written again and again, but considering it as Jatika, Jatak as caste, the horoscope will be accepted. 1 - Aries : The lord of Aries is Mars. This is Tamoguni, Char Rashi, East direction and Fire element Rashi. People of Aries zodiac are wealthy, happy with children, bright, interested in work, always engaged in charity, polite, aided by government or...