बृहदिश्वर शब्द संस्कृत से मिश्रित शब्द है। बृहत् अथार्त बहुत बड़ा, ऊंचा, विशाल , तथा ईश्वर का अर्थ है वे भगवान जो सर्वोच्च प्राणी, सर्वोच्च आत्मा आदि - अनंत साकार - आकार - निराकार सभी असीमगुणों से युक्त, अक्षय,अजेय, भगवान शिव उनका मंदिर है। बृहदेश्वर मंदिर को बृहदीस्वरर मंदिर और राजराजेश्वर मन्दिर नाम से भी जाना जाता है।
बृहदिश्वर मंदिर तमिलनाडु में कावेरी नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है । वास्तुशिल्प का अतियंत आश्चर्य और तकनीकी कला का उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत है। तमिलनाडु में यह सबसे बड़े हिंदू मंदिरों में से एक है तथा तमिल वास्तुकला का इस मंदिर में समाहित है। दक्षिण का मेरु भी कहा जाता है। चोल सम्राट राजराजा प्रथम द्वारा निर्मित, मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल का एक हिस्सा है जिसे " महान जीवित चोल मंदिर " के रूप में जाना जाता है, चोल-युग गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर और ऐरावतेश्वर मंदिर के साथ, जो इसके उत्तर-पूर्व में क्रमशः लगभग 70 किलोमीटर और 40 किलोमीटर हैं।
ग्रेनाइट का उपयोग करके निर्मित, मंदिर में एक विशाल स्तंभों वाला गलियारा है तथा भारत में सबसे बड़े शिव लिंगों में से एक है। यह अपनी मूर्तिकला की गुणवत्ता के लिए भी प्रसिद्ध है, साथ ही 11वीं शताब्दी में पीतल के नटराज , शिव को नृत्य के देवता के रूप में नियुक्त करने का स्थान होने के कारण भी प्रसिद्ध है। परिसर में नंदी , पार्वती , मुरुगन , विनायगर , सभापति, दक्षिणमूर्ति , चंडिकेश्वर , वाराही के मंदिर शामिल हैं।, तिरुवरुर के त्यागराजर, सिद्धर करुवूरर और अन्य। श्रद्धालुओं का आना जाना पूरे वर्ष ही यहाँ रहता है।
वास्तुकला, पाषाण व ताम्र में शिल्पांकन, प्रतिमा विज्ञान, चित्रांकन, नृत्य, संगीत, आभूषण एवं उत्कीर्णकला का भंडार है। यह मंदिर उत्कीर्ण संस्कृत व तमिल पुरालेख सुलेखों का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस मंदिर के निर्माण कला की एक विशेषता यह है कि इसके गुंबद की परछाई पृथ्वी पर नहीं पड़ती। शिखर पर स्वर्णकलश स्थित है। जिस पाषाण पर यह कलश स्थित है, लगभग उसका भार 88 टन है और यह एक ही पाषाण या शिला ( पत्थर )से बना है। मंदिर में स्थापित विशाल, भव्य शिवलिंग पर दृष्टि पड़ते ही वृहदेश्वर नाम उचित- उपयुक्त प्रतीत होता है।
मंदिर में प्रवेश करने पर गोपुरम् के भीतर एक चौकोर मंडप है। वहां चबूतरे पर नन्दी जी विराजमान हैं। नन्दी जी की यह प्रतिमा लगभग 19 फीट लंबी, 8 फीट चौड़ी तथा 12 फीट ऊंची है। भारत में एक ही शिला (पत्थर ) से निर्मित नन्दी जी की यह दूसरी सर्वाधिक विशाल प्रतिमा है। इस मंदिर के शिलालेखों को देखना भी अद्भुत है। शिललेखों में अंकित संस्कृत व तमिल लेख सुलेखों का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इस मंदिर के चारों ओर सुंदर अक्षरों में नक्काशी द्वारा लिखे गए शिलालेखों की एक लंबी श्रृंखला देखी जा सकती है।
मंदिर के कुछ रोचक तथ्य :
1 - मंदिर ऊंचाई लगभग 66 मीटर है। ध्यान देने योग्य यह है कि इतना विशाल और भव्य मंदिर बिना किसी नींव निर्माण के बना हुआ है।
2 - मंदिर को लगभग1.3 लाख वजन के ग्रेनाइट पत्थरों से बनाया गया है, जबकि इस मंदिर के सैकड़ों किलोमीटर दूरी के क्षेत्रों में कहीं भी ग्रेनाइट नहीं मिलता है। यह दुनिया का पहला मंदिर है, जो केवल ग्रेनाइट पत्थरों से बना है। आश्चर्य करने की बात यह है कि शिलाओं को लाने और इतना विशाल ऊंचा गर्भगृह खड़ा करने के लिए कौन सी तकनीक का प्रयोग किया गया होगा। संभवतः भगवान शिव के शक्ति से ही यह संपन्न हुआ होगा।
3 - मंदिर के शिखर ( मस्तक ) कोई परछाई नहीं बनती है। यह शिखर ( कलश ) लगभग 88 टन वजन का है, जिसके ऊपर लगभग 12 फुट का स्वर्ण कलश रखा हुआ है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि सूरज की धूप में और चांद की रोशनी में इस मदिर की परछाई जमीन में दिखाई नहीं देती है।
४ - भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर में विशाल शिवलिंग भी अद्भुत है, जिसके ऊपर छाया करने के लिए एक विशाल पंचमुखी नाग विराजमान है। दोनों तरफ 6-6 फुट की दूरी पर मोटी दीवारें हैं। बाहरी दीवार पर बनी बड़ी आकृति को 'विमान' कहा जाता है, जबकि मुख्य विमान को दक्षिण मेरु कहते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इसके शिखर पर लगे हुए पत्थर का वजन 80,000 किलो है यह एक ही पत्थर को काटकर बनाया गया है। मंदिर के शिखर तक 80 टन वजनी पत्थर कैसे ले जाया गया होगा, यह आज तक एक रहस्य बना हुआ है।
5 - मंदिर के गौपुरम में बने चौकोर मंडप के अंदर विशालकाय चबूतरे पर 6 मीटर लंबी, 2.6 मीटर चौड़ी और 3.7 मीटर ऊंची नंदी प्रतिमा है, जो एक ही पत्थर से तराशकर बनाई गई है।ध्यान देने योग्य बात यह है कि मंदिर को बनाने में 1,30,000 टन पत्थर का प्रयोग हुआ है। विशाल और भव्य मंदिर को बनाने में सिर्फ 7 साल लगे थे। वास्तुशिल्प कितना विकसित रहा होगा यह सोचने पर बाध्य करता है।
6 - मंदिर को साल 1987 में यूनेस्को ने अपनी विश्व धरोहरों में शामिल किया है। इस मंदिर में संस्कृत और तमिल भाषा में लिखे अक्षरों की सुंदर शिलालेख हैं, जिनमें गहनों के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। इससे पता चलता है कि उस समय भारत का स्वर्ण विज्ञान विकसित और परिष्कृत था। शिला लेखों में 23 प्रकार के मोती, लगभग 11 प्रकार के हीरे और माणिक की जानकारी उपलब्ध है।
7 - ध्यान देने योग्य यह है कि ग्रेनाइट की चट्टानें इतनी कठोर होती हैं कि उन्हें कटाने, छेद करने के लिए विशेष हीरे के टुकड़े लगे औजार का प्रयोग करना पड़ता है। उस कालखंड में ऐसा वास्तुशिल्प जो चट्टानों को काट कर कलात्मक मूर्तियां और सम्पूर्ण मंदिर का निर्माण किया गया होगा।
भारत के इस महान बृहदेश्वर मंदिर और महान वास्तुशिल्प के बारे में रोचक जानकारी को अपने मित्रो को व्हाट्सप्प, फ़ेसबुक सोशल मीडिया के अनेक मंचों के माध्यम से जरूर शेयर करें, इस ज्ञान से ना केवल एक दूसरे की जानकारी बढ़ती है बल्कि हमको अपने धर्म पर गर्व भी होता है। तथा धर्म और अध्यात्म के इस यात्रा में आप माध्यम भी बन जाते है।
धन्यवाद।
प्रणाम,🙏🙏🙏
ज्योतिर्विद एस एस रावत
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें