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लक्ष्य क्या है ? क्या मैं किसी एक लक्ष्य की पहले से तैयारी करूँ ?

 



मनुष्य जीवन के प्रत्येक काल खंड में उम्र के अनुसार कोई ना कोई लक्ष्य जरूर होता है। प्रत्येक व्यक्ति उम्र के अनुसार कर्तव्यों को निर्वाह करने के लिए अपने अपने लक्ष्य निर्धारित करते है, वे लक्ष्य जो कल थे, वे आज नहीं, और जो लक्ष्य आज है, वो कल नहीं, वास्तव में व्यक्ति के उम्र के अनुसार आवश्यकताएँ और कर्तव्य स्वयं ही परिवर्तित हो जाती है। इसलिए समय के अनुसार किये गए कार्य ही उचित उपयुक्त होते है, अन्यथा यदि समयानुसार लक्ष्य संपन्न नहीं  हो तो उसके उपरांत यह औपचारिकता मात्र ही रह कर रह जाती है।

तैयारी करना केवल मामले को जटिल करेगा और बाद में उन्हें मिलने वाली खुशी को सीमित करेगा। इसलिए, सफलता प्राप्त करने के लिए भविष्य के लिए तैयारी करना सबसे सटीक काम नहीं है।

किसी व्यक्ति के पास जो सबसे बड़ी शक्ति होती है, वह चुनने की शक्ति होती है।

चुनाव की प्रक्रिया ही सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिस व्यक्ति को चुनाव का कौशल हो वह व्यक्ति जीवन यात्रा के सभी विषयों का विशेष चयन और समय के अनुसार महत्व को जानकर ही विषय, वस्तु या व्यक्ति को चुनता है। यदि चुनाव एक पक्ष / विषय हो तो व्यक्ति जीवन दर्शन को समानांतर उपलब्धि के रूप में नहीं देख पाता है। निश्चित रूप से सुख में अल्पता  ही मिलेगी, व्यक्ति का जीवन भले ही सामान्य हो किन्तु चयन समयानुसार उचित करने से जीवन के प्रत्येक विषय में समानताएं से ओत प्रोत ही होंगे, और भरपूर सुख, आनंद, प्राप्त करेगा। मनुष्य का कर्तव्य ना केवल स्वयं के विकास को समय देना है बल्कि उसकी अगली पीढ़ी को भी सहयोग करना चाहिए, यदि मनुष्य स्वयं को अधिक समय देता है, तो वह अगली पीढ़ी का सहयोग कैसे कर सकता है ? उसकी  भागीदारी यदि अल्प हो तो अगली पीढ़ी के लिए वही संघर्ष छोड़ देता है जिनको पूरा करने के लिए उसने जीवन के महत्वपूर्ण समय गवां दिए थे। अथार्त उन्ही मूलभूत चीज़ो, वस्तुओं, विषयों में ही उलझकर वह पीढ़ी भी रह जायेगी। केवल स्वयं को समय देना ठीक ऐसा ही होगा जैसे : 

"बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर, पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर"


अथार्त व्यक्ति की जिम्मेदारी ना केवल स्वयं की है बल्कि अगली पीढ़ी का मार्ग रक्षक की भी जिम्मेदारी होती है। साधारणतया समाज में लोगों को देखने, सुनने से ज्ञात होता है कि वे यह सोचते तो है की उनके माता - पिता का साथ उनके जीवनकाल में अधिक से अधिक हो,माता - पिता के मार्गदर्शन, मार्गरक्षक में ही हमारा जीवन यापन हो, लेकिन वे ऐसा कदापि नहीं सोचते है कि उनके बच्चे भी भविष्य में इन्हीं अपेक्षा, आकांक्षा के सपनों में अपना जीवन देखेंगे। हमको पुनः सोचना चाहिए जिन संघर्ष से हम निकल कर आये है क्या वही चुनौती हम उनको देकर जाएंगे। फिर पीढ़ी विकास की कल्पना क्या होगी ? आज का मनुष्य स्वयं विकासवाद में जुटा है, यह जरुरी भी है लेकिन पीढ़ी के विकास को भी उतना ही महत्व देना जरुरी है। वर्तमान मनुष्य के स्वयं विकास का कारण हमारे पूर्वज है, क्योंकि उन्होंने पीढ़ी विकास तो किया था, लेकिन स्वयं विकास में ध्यान नहीं दिया था। और वो दिन दूर नहीं जब पुनः पीढ़ी विकास ही मनुष्य की पहली जरुरत होगी, शायद कुछ देशों में इसकी जरुरत देखने को मिल रही है जैसे की आज जापान में आंशिक रूप से देखा जा सकता है। इसलिए सुबह का भुला अगर शाम को घर लौट आ जाय तो उसको भुला नहीं कहते है ठीक इसी प्रकार यदि वर्तमान का मनुष्य स्वयं विकास के साथ पीढ़ी विकास पर उतना ही ध्यान देना शुरू कर दे तो मानव विकास निकट भविष्य में ऊचाइयों पर पहुंच कर निर्णायक हो सकता है, क्योंकि भविष्य के पीढ़ी के पास साधन, संसाधन और समय तीनों ही उपलब्ध रहेगा तो स्वाभाविक रूप से नए शोध, अनुसंधान कर, मानव विकास को शीर्ष तक ही नहीं पहुँचायेगा बल्कि स्वयं भी उसका आनंद लेकर पीढ़ी को भी  आनंदित कर सम्पूर्ण मानव विकास को सतत्त समानंतर रखने में सफल रहेगा।  



नियम और सिद्धांत क्या है,  लक्ष्य के लिए कौन उपयोगी है  ?



यद्यपि दोनों चीजें आपके कार्य करने और निर्णय लेने के तरीके को निर्धारित करती हैं, नियम बाहर से थोपे जाते हैं और किसी प्रकार के दंड (सजा, जुर्माना, छंटनी, जेल आदि) से बचने के लिए नियम का पालन किया जाना चाहिए, जबकि सिद्धांत हैं आंतरिक, और आपको वह करने के लिए मजबूर करता है जो आपको लगता है कि यह सही है। सिद्धांत-आधारित दृष्टिकोण का अर्थ विस्तृत, आदेशात्मक नियमों के बजाय उच्च-स्तरीय, मोटे तौर पर बताए गए सिद्धांतों पर निर्भर होना है। जबकि नियम-आधारित दृष्टिकोण के लिए लोगों को वर्णनात्मक प्रक्रियाओं, प्रथाओं का सख्ती से पालन करने की आवश्यकता होती है, सिद्धांत-आधारित दृष्टिकोण अधिक परिणाम-उन्मुख है, सिद्धांत से मनुष्य ऊर्जावान, गतिशील, सतत्त प्रयासरत, लक्ष्य की प्राप्ति सफल एवं आनंदित रहता है , जबकि नियम पराधीन के आभास होने के कारण उक्त सभी विषय में अल्प अनुभव कर, कुंठित भाव उत्पन्न हो सकते है। नियम जटिल और सिद्धांत सरल होते है, इसलिए कहना उचित होगा कि जीवन विकास और पीढ़ी विकास को किसी नियम से नहीं बल्कि सिद्धांत से उत्तम रखा जा सकता है। नियम थोप कर विसंगति उत्पन्न हो सकती है


धन्यवाद। 


प्रणाम, ज्योतिर्विद एस एस रावत

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