यह मेरे निजी जीवन से आधारित है, इसमें किसी घटना का उल्लेख नहीं किया गया है। स्वयं अथवा किसी व्यक्ति विशेष को दुःख पहुँचाना मेरा उद्देश्य नहीं है। मैं इन सभी घटनाओं को "जीवन दर्शन" का नाम देना चाहूँगा। आप इन सभी बातों को कितना महत्व देते है, यह मैं आप पर छोड़ता हूँ।
जब हम किसी वस्तु, व्यक्ति या किसी घटना के लिए उत्तरदायी हों, यह जिम्मेदारी कहलाती है। जिम्मेदारी के लिए जब उपयुक्त साधन नहीं होते, तब संघर्ष का प्रारम्भ होता है। संघर्ष करते रहने पर भी जिम्मेदारी के मनोनुकूल सफलता नहीं मिल पाती तब घोर विपत्ति जन्म ले लेती है। इस विषम परिस्थिति में आवश्यकता, आकांक्षा, भरोसा सबसे पहले परिवार, मित्र, समाज आदि से होती है। जब यह सहयोग उनसे नहीं मिलता, जिसकी हम ने अपेक्षा की थी तब जीवन दर्शन के "प्रथम चरण" का उदगम हो जाता है।
उदाहरण : किसान खेत में बीज बोकर बीज को मिट्टी से दबा देते है। उस बीज को अब साँस लेना तक कठिन हो जाता है। एक अजीव छटपटाहट से जूझता रहता है। किन्तु उसको भी पता नहीं रहता कि वह सृष्टि क्रम का एक प्रमुख पात्र है।
पुनः हमारे अन्तः मन में एक विचार जन्म लेता है और जब लगातार रिश्तों से असहयोग व्यक्ति के समक्ष आते रहते है तब विचार, विचारधारा में परिवर्तित हो कर जिम्मेदारी, संघर्ष, विपत्ति को हथियार बना कर, आगे बढ़ चलता है। रोज नित् स्वयं के संसार में डूबकर, संसार के सामने में ही ओझल हो जाते है। जिधर भी नज़रों से देखूँ उधर ही देखा नहीं जाता । धीरे -धीरे सृष्टि और काल के निर्णय से परिस्थितयाँ बदलती है अब परिवार और समाज का भी नजरिया बदलने लगता है, लेकिन जैसा बदलना चाहिए, वैसा अभी भी नहीं बदला । किन्तु अब तक व्यक्ति को सृष्टि और काल से अनुभव हो चुका होता है। अतः अब उतना फर्क नहीं पड़ता है। जितना की अतीत में व्यक्ति भयभीत था। यह जीवन दर्शन का "द्वितीय चरण" है।
उदाहरण : किसान के बीज बोने के उपरांत बीज से अंकुर निकल कर स्वयं को कद देता है। साथ ही साथ डरता भी है क्योंकि अधिक मात्रा में वह अंकुर पानी, धूप, हवा आदि को सह नहीं सकता है।
क्रमशः हम आगे बढ़ कर कुछ नये आयाम तक पहुँच जाते है। इस बार भी समाज के व्यवहार में परिवर्तन दिखाई पड़ता है।अब वही लोग मेरे परिचय से स्वयं को जोड़ना शुरू कर देते है। लेकिन पुनः स्पष्ट दिखाई देता है कि यह सिर्फ स्वार्थ है। अथवा औपचारिकता मात्र है। क्योकि अभी भी समय - समय पर आरोप - आलोचना होती रहती है किन्तु हम जैसा करते आये है, उसे क्रमबद्ध कर अथक परिश्रम से, कष्टों को पृथक - पृथक कर, आगे बढ़, शीर्ष, शिखर अथवा सफलता तक पहुँच जाते है। अथार्त कठिन परिश्रम कर, स्वयं से रास्ता बनाकर, लक्ष्य के मंच में विराजमान होकर, कीर्तमान स्थापित करते है। यह जीवन दर्शन का "तृतीय चरण" है।
उदाहरण : किसान ने बीज बोया, बीज से अंकुर निकल कर अब वृक्ष बनकर स्वयं फलों से लदा हुआ है। जो उदरपूर्ति, छाया, ऑक्सीजन आदि देने में तथा ,अति हवा, पानी, धूप सहने में सक्षम हो चुका है।
विशेष :
तदोपरान्त पुनः वे लोग अब प्रेरणा के वृक्ष के नीचे आकर बैठ जाएंगे।
यदि जिम्मेदारी और संघर्ष बाल्यावस्था में मिल जाय, तो व्यक्ति का जीवन धन्य हो जायेगा। क्योंकि व्यक्ति के पास अर्जित अनुभव उसके जीवन शेष को आनंदमय बना देगा। और यदि इसके विपरीत हो तो अथार्त बाल्यावस्था में सुख, वृद्धा अवस्था में संघर्ष हो जाय तो जीवन अत्यधिक कठिन हो जायेगा। बहुत बार यह भी देखा गया है कि व्यक्ति जीवन से टूट कर जीवन को ही खो देता है।
क्या सीख मिलती है :
अतः हमें अपने बच्चों को सिमित अथवा आवश्यक साधन, लालन पालन, इच्छा पूर्ति आदि सावधानी से करनी चाहिए। बच्चों को बच्चे जैसा ही जीने दें, सृष्टि से सीखने दें। कष्ट,परेशानी, संघर्ष, जिम्मेदारी का बोध अपरोक्ष रूप से प्रदर्शन कर, करना चाहिए। यह अनुभव उनको जीवन जीने का, आत्मविश्वास, संस्कार, विद्या ग्रहण आदि के रास्ते सुगम करेगा। बार बार किये प्रयास उनके जीवन में संस्कार को जन्म देंगे।
प्रणाम, ज्योतिर्विद एस एस रावत
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