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भगवान जगन्नाथ मंदिर के आश्चर्य एवं मन्दिर से जुड़ी कथाएँ

 मन्दिर से जुड़ी कथाएँ :


इस मन्दिर के उद्गम से जुड़ी परम्परागत कथा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की इन्द्रनील या नीलमणि से निर्मित मूल मूर्ति, एक अगरु वृक्ष के नीचे मिली थी। यह इतनी चकाचौंध करने वाली थी, मालवा नरेश इंद्रद्युम्न को स्वप्न में यही मूर्ति दिखाई दी थी। तब उसने कड़ी तपस्या की और तब भगवान विष्णु ने उसे बताया कि वह पुरी के समुद्र तट पर जाये और उसे एक दारु (लकड़ी) का लठ्ठा मिलेगा। उसी लकड़ी से वह मूर्ति का निर्माण कराये। राजा ने ऐसा ही किया और उसे लकड़ी का लठ्ठा मिल भी गया। उसके बाद राजा को विष्णु और विश्वकर्मा शिल्पकार कारीगर और मूर्तिकार के रूप में उसके सामने उपस्थित हुए। किन्तु उन्होंने यह शर्त रखी, कि वे एक माह में मूर्ति तैयार कर देंगे, परन्तु तब तक वह एक कमरे में बन्द रहेंगे और राजा या कोई भी उस कमरे के अन्दर नहीं आये। माह के अंतिम दिन जब कई दिनों तक कोई भी आवाज नहीं आयी, तो उत्सुकता वश राजा ने कमरे में झाँका और वह वृद्ध कारीगर द्वार खोलकर बाहर आ गया और राजा से कहा, कि मूर्तियाँ अभी अपूर्ण हैं, उनके हाथ अभी नहीं बने थे। राजा के अफसोस करने पर, मूर्तिकार ने बताया, कि यह सब दैववश हुआ है और यह मूर्तियाँ ऐसे ही स्थापित होकर पूजी जायेंगीं। तब वही तीनों जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ मन्दिर में स्थापित की गयीं।



चारण परम्परा मे माना जाता है की यहाँ पर भगवान द्वारिकाधिश के अध जले शव आये थे जिन्हे प्राचि मे प्राण त्याग के बाद समुद्र किनारे अग्निदाह दिया गया (किशनजी, बल्भद्र और शुभद्रा तीनों को साथ) पर धरती आते ही समुद्र उफान पर होते ही तीनों आधे जले शव को बहाकर ले गया ,वह शव पुरी मे निकले ,पुरी के राजा ने तीनों शव को अलग अलग रथ मे रखा (जिन्दा आये होते तो एक रथ मे होते पर शव थे इसिलिये अलग रथों मे रखा गया) शवो को पूरे नगर मे लोगों ने खुद रथो को खिंच कर घुमया और अंत मे जो दारु की लकड़ी के साथ तैर कर आया था उसी   की पेटी बनवाके उनको धरती माता को समर्पित किया, आज भी उस परम्परा को निभाया  जाता है पर बहुत कम लोग इस तथ्य को जानते है, ज्यादातर लोग तो इसे भगवान जिन्दा यहाँ पधारे थे ऐसा ही मानते है। 



सोचने पर मजबूर कर देते हैं भगवान जगन्नाथ मंदिर के ये आश्चर्य :



हवा से विपरित लहराता है झंडा :


आमतौर पर दिन के समय हवा समुद्र से धरती की तरफ चलती है और शाम को धरती से समुद्र की तरफ, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि यहां यह प्रक्रिया उल्टी है।  मंदिर का झंडा हमेशा हवा की दिशा के विपरीत लहराता है। हवा का रुख जिस दिशा में होता है झंडा उसकी विपरीत दिशा में लहराता है। 


रसोई का रहस्य :


कहा जाता है कि जगन्नाथ मंदिर में दुनिया की सबसे बड़ी रसोई है. रसोई का रहस्य ये है कि यहां भगवान का प्रसाद पकाने के लिए सात बर्तन एक के ऊपर एक रखे जाते हैं, ये बर्तन मिट्‌टी के होते हैं जिसमें प्रसाद चूल्हे पर ही पकाया जाता है।  आश्चर्य की बात ये है कि इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान सबसे पहले पकता है फिर नीचे की तरफ से एक के बाद एक प्रसाद पकता जाता है। जबकि विज्ञान के पास इसका कोई उत्तर नहीं है। 


नहीं दिखती मंदिर की परछाई :


जगन्नाथ मंदिर करीब चार लाख वर्ग फीट एरिया में है. इसकी ऊंचाई 214 फीट है।  किसी भी वस्तु या इंसान, पशु पक्षियों की परछाई बनना तो विज्ञान का नियम है, लेकिन जगत के पालनहार भगवान जगन्नाथ के मंदिर का ऊपरी हिस्सा विज्ञान के इस नियम को चुनौती देता है, यहां मंदिर के शिखर की छाया हमेशा अदृश्य ही रहती है। 


नहीं नजर आते पक्षी :


आमतौर पर मंदिर, मस्जिद या बड़ी इमारतों पर पक्षियों को बैठे देखा होगा, लेकिन पुरी के मंदिर के ऊपर से न ही कभी कोई प्लेन उड़ता है और न ही कोई पक्षी मंदिर के शिखर पर बैठता है, भारत के किसी दूसरे मंदिर में भी ऐसा नहीं देखा गया है। 


12 साल में बदली जाती है मूर्तियां :


यहां हर 12 साल में जगन्नाथजी, बलदेव और देवी सुभद्रा तीनों की मूर्तिया को बदल दिया जाता है। नई मूर्तियां स्थापित की जाती हैं, मूर्ति बदलने की इस प्रक्रिया से जुड़ा भी एक रोचक किस्सा है। मंदिर के आसपास पूरी तरह अंधेरा कर दिया जाता है, शहर की बिजली काट दी जाती है. मंदिर के बाहर CRPF की सुरक्षा तैनात कर दी जाती है। सिर्फ मूर्ती बदलने वाले पुजारी को मंदिर के अंदर जाने की इजाजत होती है। 


अन्य : 


1- जगन्नाथ पुरी में किसी भी स्थान से आप मंदिर के शीर्ष पर लगे सुदर्शन चक्र को देखेंगे तो वह आपको सदैव अपने सामने ही लगा दिखेगा ।


2- यहां सामान्य दिनों के समय हवा समुद्र से जमीन की तरफ आती है और शाम के दौरान इसके विपरीत, लेकिन पुरी में इसका उल्टा होता है ।


3- सबसे बड़ा चमत्कार इस मंदिर का यह है कि मंदिर के अंदर पकाने के लिए भोजन सामग्री की मात्रा पूरे साल भर के लिए एक बार में ही रख दिया जाता है और पूरे साल लाखों श्रद्धालुओं के प्रसाद खाने के बाद भी प्रसाद की एक बूंद भी व्यर्थ नहीं जाती, जबकि भक्तों की संख्या हर साल कम या अधिक होती है। जितना प्रसाद बनता हैं, मंदिर बंद होने के समय तक सबको मिल भी जाता हैं और बचता भी नहीं ।


4 - मंदिर के सिंहद्वार में पहला कदम रखते ही समुद्र से निकलने वाली किसी भी प्रकार की ध्वनि को नहीं सुना जा सकता ।


5 - इस मंदिर का रसोईघर दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर बताया जाता हैं ।


6 - प्रतिदिन शाम के समय मंदिर के ऊपर लगे ध्वज को मनुष्य के द्वारा उल्टा चढ़कर ही बदला जाता है ।


7 - दुनिया की सबसे बड़े रसोईघर में भगवान जगन्नाथ के भोग के लिए बनने वाले महाप्रसाद को बनाने के लिए कुल 500 रसोइयां एवं उनके 300 सहायक सहयोगी एक साथ काम करते हैं । सबसे बड़ी बात यह हैं कि ये सारा महाप्रसाद आज भी मिट्टी के बर्तनों में ही पकाया जाता है। 



नवकलेवर  :

जगन्नाथ मंदिर की एक अनूठी परंपरा है जिसे नवकलेबारा कहा जाता है। यह हर 8, 11, 12 और 19 साल में किया जाता है। “नबाकलेबारा” एक ऐसा शब्द है जिसका अर्थ है “नया अवतार।” यह परंपरा ज्योतिषीय और खगोलीय गणनाओं से आती है, और इसका अर्थ है कि देवताओं की जिन लकड़ी की मूर्तियों की लोग पूजा करते हैं, उन्हें बदल दिया जाता है।

नवकलेबारा प्रक्रिया के 12 चरण हैं। वे हैं: एक जंगल में जाना, दिव्य वृक्षों को खोजना, पेड़ों से लकड़ी को काटना और आकार देना, पुरी में लकड़ी लाना, नई मूर्तियाँ बनाना, पुरानी मूर्तियों को दफनाना और भक्तों को दिखाने के लिए नई मूर्तियाँ लाना।

समारोह  :

लगभग 12 बड़े त्यौहार और कुछ छोटे त्योहार मंदिर में बड़े उत्साह के साथ मनाए जाते हैं। इन सभी आयोजनों को “द्वादस यात्राएँ” कहा जाता है। ये हैं स्नाना यात्रा, सयाना यात्रा, पार्श्व परिवर्तन, देव उत्तपन, दक्षिणायन, पुष्यविषेक, प्रवरण षष्ठी, डोला यात्रा, मकर संक्रांति, चंदन यात्रा, अक्षय तृतीया, दमनक चतुर्दशी और नीलाद्रि महोदय।

प्रणाम, एस एस रावत 

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